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GIRIDHAR - VIDYADHAR
घड़ी मे डंके बजाते ही वक़्त की आवाज़ मेरे कानों मे गूंजने लगती है. ओह, आज भी स्कूल जाने मे देरी होगी. मम्मी...... मम्मी मेरा यूनिफॉर्म कहा है? आज पीटी स्जा पीरियड है; मेरे व्हाइट शूज निकाल दो. मम्मी, मेरे सॉक्स नही मील रहे है. और हाँ..... रीसेस मे ज़ोरो की भूक लगती है, नाश्ता जरा ज्यादा देना. अरे हँ.........वाटर बेग भर लू, नही तो पानी की लाइन मे ही रीसेस खत्म हो जाएगी. आज शनिवार......... पीटी, गणित, सायन्स, हिन्दी, इंग्लीश और हिस्ट्री........... ओह....गॉड.....हिस्ट्री का तो home work अभी बाकी है. मूगल वंश; शिवाजी; संभाजी; हूमायूं और अकबर............ह्म्म्ममम..... मम्मी मूज़े खाना नही है, देर हो रही है, बस छूट जाएगी.
मेरा दिल करता है की घड़ी को तोड़ दूँ. दूनियाकी सारी घड़ियाँ तोड़ दूँ. अलार्म ...... मेरी मीठी मीठी नींद का दूष्मन. सवेरे ऊठकर खेलने को, जॉगिंग करने को दिल करता है, पर स्कूल पहोचने की फिक्र............. फिर ऊपर्से टाइम टेबल, दोपहर को कंपलसरी एक घंटा सो जाना, शामको ट्यूशन और रात को टीवी..............
मेरा दिल जब सोने को करता है, तब जागना पड़ता है और जब खेलने को करता है, तब ज़बरदस्ती सोना पड़ता है....... क्यों?????? ऐसा क्यों??? जो मूज़े अच्छा नही लगता वाही क्यों करना पड़ता है?...... मैं छोटा हूँ इसीलिए???
ओह हो.............. मैं कब बड़ा बनूँगा? अपनी मरज़ई का मालिक..... इच्छा हुई तो ऊठे, य्ही तो देर ताक़ बिस्तर पर मीठी मीठी नींद लेते रहे. सवेरे जॉगिंग करना, पापा की तरह चाय पीते पीते अखबार पढ़ना..... बाथरूम मे गाने गाते गाते देर ताक़ नहाते रहना और हाथ मे बेग लेकर शान के ऑफीस जाना........... No home work, no reading, no school, no hurry and no worry..........
टीन...टीन....... अरे अरे........ बस रोको ...... मेरी स्कूल आ गयी. यह पहाड़ जितना बड़ा स्कूल बेग...... इसे ऊठकार चलने से सांस फूल जाती है....... अरे हा...... याद आया, एक बार हिन्दी के टीचर ने कहा था की "बाल श्री कृष्ण ने पूरा के पूरा गोवर्धन परबत उठाया था, इसीलिए उनको गोवर्धन ना से जाना जाता है." तब.....तब.........तो मेरा नाम.........नही...नही..... हम सभी का नाम......."विद्याधर" होना चाहिए...... क्यों? हैना????...........क्योंकि पहाड़ की तरह इस बेग को हम एक दिंन नही..... हर रोज़ जो उठाते है.
YES............. MY NAME............. NO......NO........ OUR NAME IS............. GIRIDHAR.......VIDYADHAR.........
टन....टन.....टन......भागो.......विद्याधर...... स्कूल की लॉंग बेल हुई, भागो..... इस घड़ी की तरह यह स्कूल बेल भी मेरा एक नंबर का दूष्मन है. बेल बजाते ही .........किताब, टीचर, इंग्लिश, हिन्दी, ग्रामर.......रट्टा मारो, थोक बंद कापिया, हिदायते......और home work.......
मेरी आँखे छोटी लगाने लगी इन सबके लिए, और मूज़े दूसरी दो आँखे मिल गयी, गिफ़्ट मे..... नही समझे????? दोस्तो..... मेरी छोटी छोटी आँखों पर बड़े से चश्मे फिट हो गये...........
मेरी चार आंखो वाली दुनिया........ घड़ी की सुईओं पर चलता हुआ हमारा परिवार........ मम्मी, पापा की नौकरी, दीदी और मेरा स्कूल, ट्यूशन .......कभी भाग रहे है.....सभी जल्दी मे है......इसीलिए कुछ चूक जाते है......और इस वजहसे मम्मी, पापा का गुस्सा कभी मुझपर निकलता है.........बेचारा .....मैं.......... सबसे छोटा हूँ...........
मम्मी चाहती है मैं क्रिकेटर बनू और पापा की इच्छा है की डॉक्टर.... लेकिन कोई भी मुझ से नही पूछता की मुझे क्या बनना है. मुझे क्या अछा लगता है...... सच बताऊ..... मन तो करता है, झूले पर बैठ कर झूलू, रात मे आकाश सा तारे देखू, ऊँके दोस्ती करू, तितलियों के पीछे भागू............
पक्षियों को समय का बंधन नही होता, हवा के गले मे कोई स्कूल की घंटी नही लटकाता, जब की मैं???? घरवालों की इचाओं मे जकड़ा हुआ हूँ............... नही, मुझे डॉक्टर नही बनना, क्रिकेटर बनकर शेखी नही मारनी...... मुझे तो बनना है....मेरी इच्छाओंका, अकांशाओंका बादशाह.............
बस!!!!! मुझे बड़ा होना है, अपने मनमर्जी से जीने मिले, इतना बड़ा......... मुझे सबसे छोटा, नासमझ, "बिचारे" बचपन का बोझ लगता है..... मुझे तो चाहिए बोझ बगैर का ग्यान, मुक्त आनंद और छोटे हो फिर भी अपनी मनमर्जी से जी सके ऐसा मनमोहक सूंदर जीवन.... जिसे देखकर बड़े भी कह ऊठे..........................
यह दौलत भी लेलो; यह शोहरत भी लेलो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो, बचपन का सावन वो काग़ज़ की कश्ती; वो बारिश का पानी..............................
(THIS SCRIPT IS PSYCHOLOGY OF A SCHOOL GOING CHILD BETWEEN 10-15 YEARS OF AGE. THE SCRIPT TO BE USED FOR MONO ACTING TOO.) .................................................अमीन......................
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